Shayari – 8


इंसान इंसान का नहीं होता।

इसलिए तो हर कदम पर वो है रोता।

ये दुनिया है एक ऐसा बाज़ार।

जहां सबकुछ होता है तार – तार।

Ashish Kumar

Note: This is an extract from my Hindi poem titled, Bazar. The full poem can be read here

Shayari – 6


ज़िन्दगी में जब,

कुछ अनकही बातें, कुछ अनकहे सत्य का पता चलता है।

हालात इधर से उधर हो जाते हैं।

अचानक करवट लेते हुए दिल ये कहता है,

कब कहां क्या हो जाए क्या पता।

समय के आगे किसका क्या चलता है।

समय आगे किसका क्या चलता है।

Ashish Kumar

थोड़ा तुम बताओ , थोड़ा मैं बताऊँ |


उस कली की बात मैं क्या बताऊँ |
उस मुस्कान की खूबसूरती क्या बताऊँ |
वो जो करती है अपनी ज़ुल्फ़ों से नखरे |
उस हाज़िर जवाब इंसान की दास्ताँ क्या बताऊँ |
जो मिली नसीब से , उस संजीवनी की व्याख्या क्या बताऊँ |
दिल में बस गयी और साँसों में समां गयी |
उस नाचीज़ की हाल -ऐ -दास्ताँ मैं क्या बताऊँ |ख़याल आता है मुझे अब तेरा हर वक़्त |
जिंगदी थम सी गयी है बेवक़्त |
वो क्या जादू है तुझमे जिसमे मैं फिसल गया |
तुम्हारे ख्यालों में मैं बस गया |
तेरे होटों की मुस्कराहट कहती है कुछ और |
ज़ुबान पर बोल बोलती है तू कुछ और |
दिल में तेरे कुछ चल रहा है |
क्या वो मेरे लिए धड़क रहा है ?
रख कर दिल पर हाथ एक बार सोचो |
अपने आप से मेरे बारे में पूछो |
जो तेरे दिल में बस्ता है…
जो मेरे दिल में बस्ती है…
थोड़ा तुम बताओ , थोड़ा मैं बताऊँ |
थोड़ा तुम बताओ , थोड़ा मैं बताऊँ |
अब कली से तुम फूल बन जाओ …
अब कली से तुम फूल बन जाओ …

Ashish Kumar