शाम ढले एक बात चली है…


शाम  ढले  एक  बात  चली  है। 
कागज़  पर  कलम, फिर  एक  बार  चली  है। 

ज़िन्दगी  तो  ज़िन्दगी  है , वो  चल  रही  है। 
सुख  हो  या  दुःख , आगे  बढ़  ही  रही  है। 
गिरते  गिरते  संभालना , उठ कर  फिर  चलना। 
मुसीबत  को  दफना  कर  युहीं  चलना। 
यही कोशिश  हर  वक़्त  हो  रही  है। 
राह  में  कांटो  की  आंधी  हो  चली  है। 
इस  आंधी  में  धूप, फिर  एक  बार  खिली  है। 
शाम  ढले  एक  बात  चली  है।  
कागज़  पर  कलम , फिर  एक  बार  चली  है। 

अंतर्मन  की  शक्ति  पहचान  कर। 
मौसम  का  बदले  मिज़ाज़  को  भांप  कर। 
कारवां  बढ़  रही  है। 
कभी  आसमान  तो  कभी  आँखों  से  बारिश  हो  रही  है। 
और  ज़िन्दगी  यूँ  ही  चल  रही  है। 
लाख  दुआ  लाख  कोशिश  शायद  ही  काम  आती  है। 
जब  इरादे  नेक  हो  तो  मंज़िल  मिल  ही  जाती  है। 
इस  मंज़िल  को  पाने  की  ललक  ज़रूरी  है। 
हर  सुबह  एक  नयी  किरण  लाती  है। 
आँखों  की  बारिश  को  मिटाती  है। 
यही  बात  तो  समझनी  है। 
ज़िन्दगी  है  और  इसमें , 
उम्मीद  की  कलि  फिर  एक  बार  खिलनी  है। 
शाम  ढले  एक  बात  चली  है। 
कागज़  पर  कलम , फिर  एक  बार  चली  है। 
कागज़  पर  कलम , फिर  एक  बार  चली  है।  

- Ashish Kumar
PC: Google

जज़्बात


जज़्बात कभी हालात ने बदले,

तो कभी मुलाकात ने बदले।

जज़्बात कभी रात के अंधियारों ने बदले,

तो कभी जीवन के अंधकार ने बदले।

कभी आग की लपटों में जज़्बात जल गए,

तो कभी दिल की आग में धुआं बन उड़ गए।

शाम ढलते कभी दिल के कब्र में चले गए,

तो कभी भोर होते वापस दिल में बस गए।

जज्बात कभी कोहरा बन उड़ गए,

तो कभी अश्रुओं की बारिश में बह गए।

जज़्बात कभी हालात ने बदले,

तो कभी मुलाकात ने बदले।

दिलवालों की बस्ती में कभी दिल ही न मिले।

फिर इंसान का दिल भगवान या खुदा से कैसे मिले?

क्या थे और क्या से क्या हो गए।

कभी दूध और पानी के प्यासे थे,

अब खून के प्यासे हो गए।

इतने रंग बदले कि बेरंग हो गए,

जज़्बात अब कागज़ में ही गुम हो गए।

जज़्बात अब कागज़ में ही गुम हो गए।

Ashish Kumar

बात


बात सिर्फ इतनी है, कि बात कुछ भी नहीं।

बस यही बात है, जो मुसीबत की जड़ है।

इसी बात में, गौण हो रहे जज़्बात।

मालूम नहीं कैसे, बिगड़ जाते हालात।

बात सिर्फ इतनी है, कि बात कुछ भी नहीं।

हमारी सब सुने, पर हम किसी की नहीं।

अहंकार में लिप्त हुई, इंसान की सोच।

अपनापन हमदर्दी छोड़, हो रहे सब मदहोश।

बात सिर्फ इतनी है, कि बात कुछ भी नहीं।

कहते हैं जिसे इंसान, पर वो इंसान नहीं।

मानव निर्मित हथियार और मिसाइल ने,

सिर्फ मानव को ही मारा।

कितने घर किए बर्बाद, और कितनों को उजाड़ा।

इस कदर बार बार, मानवता को ही मारा।

हमने मिसाइल तो बनाया, पर “मिसाल” कब बनेंगे?

इस अंधे दौड़ से, बाहर कब निकलेंगे?

बात सिर्फ इतनी है, कि बात कुछ भी नहीं।

मैं ही सिर्फ सत्य हूं, और बाकी कुछ नहीं।

असल सत्य जो है वो “मैं” नहीं,

और “मैं” जो है वो सत्य नहीं।

यही बात है जो समझनी है।

बात सिर्फ इतनी है, कि बात कुछ भी नहीं।

बात सिर्फ इतनी है, कि बात कुछ भी नहीं।

Ashish Kumar