Shayari – 9


कोरोना के इस काल में …
ज़िन्दगी तबाह हो रही पर कब तक, ये पता नहीं।
कितनी दूर तलक जाएगी ये त्रासदी, मालूम नहीं।
बस यही कहना चाहता हूँ …
धीरज धार , खुद पे विश्वास रख।
ये दिन भी कटेंगे , हम जीतेंगे और जीतकर बाहर आएंगे।
हम फिर से एक बार मुस्कुरायेंगे।
हम फिर से एक बार मुस्कुरायेंगे।

– Ashish Kumar

कोरोना, तांडव करो न…


दुनिया में आयी एक ऐसी महामारी |
हर जगह मच गयी त्राहि त्राहि |
मानव हो रहे बेचैन और परेशान |
एक सूख्म जीव ने कर दिया विश्व को हैरान |
खतरों से खेलने वाले आज खतरे में हैं |
लाखों लोग इस से प्रभावित हो रहे हैं |
कहते हैं इसे जग में कोरोरना |
अब और तांडव मत करो न |

PC: Google

इस महामारी का अब तक कोई तोड़ नहीं |
कितनों को ले डूबेगी पता नहीं |
अचाननक शुरू हुई जुंग कब ख़त्म होगी ?
कोरोना से राहत कब मिलेगी ?
लाशों का अम्बार लगा दिया इसने |
इटली, स्पेन, इंग्लैंड और अमेरिका में |
समझ नहीं आ रहा ये सब क्यों हुआ ?
चीन से शुरू हुआ और विश्व को बर्बाद किया |
कौन ज़िम्मेदार है इस भयावह नज़ारे की |
लाशों का ढेर है खरीददार कोई नहीं |
ज़मीन काम पर रही लाशों को दफ़नाने में |
रूहें काँप रही हैं इस खौफनाक मंज़र में |
कहते हैं इसे जग में कोरोना |
अब और तांडव मत करो न |

PC: Google

कुछ बुद्धिजीवों को इकॉनमी की पड़ी है |
लोग मर रहे हैं उनकी सुध नहीं है |
धंधे में नुक्सान की पड़ी है |
आर्थिक इस्थ्ती तो फिर से सुधर जाएगी |
इंसान बचेंगे तभी इकॉनमी रहेगी |
कालाबाज़ारी में मुनाफे की दुकान चला रहे हैं कुछ |
इंसानियत भूल कर अनाज का कत्लेआम कर रहे हैं कुछ |
लड़ाई लम्बी है और लड़ना है |
साथ मिल के इस जंग को जीतना है |
ईश्वर से यही प्राथना है …
कहते हैं इसे जग में कोरोना |
अब और तांडव मत करो न…

– Ashish Kumar

Shayari – 8


इंसान इंसान का नहीं होता।

इसलिए तो हर कदम पर वो है रोता।

ये दुनिया है एक ऐसा बाज़ार।

जहां सबकुछ होता है तार – तार।

Ashish Kumar

Note: This is an extract from my Hindi poem titled, Bazar. The full poem can be read here

Shayari – 6


ज़िन्दगी में जब,

कुछ अनकही बातें, कुछ अनकहे सत्य का पता चलता है।

हालात इधर से उधर हो जाते हैं।

अचानक करवट लेते हुए दिल ये कहता है,

कब कहां क्या हो जाए क्या पता।

समय के आगे किसका क्या चलता है।

समय आगे किसका क्या चलता है।

Ashish Kumar