मानो तो सब कुछ है …


मानो तो सब कुछ है …
और न मानो तो शून्य।
यही है जीवन का,
एक अनोखा मूल्य।
ढूंढने की ज़रुरत नहीं।
पहचानने की आवश्यकता है।
अपने अंदर छिपे इस “परम सत्य ” को।
अनुभव करने की आवश्यकता है।
जग घूमने की ज़रुरत नहीं।
कण कण में वो बस्ते हैं।
एक बार झाँक कर तो देखो।
दिल , दिमाग और मन में वो निवास करते हैं।
उन्हें पाना कठिन नहीं पर।
कठिन तरीके अपनाते हैं लोग।
विधि , विधान और आडम्बर की ज़रुरत नहीं।
फिर भी दिखावा और आडम्बर करते हैं लोग।
जो मन के भीतर हैं।
वो बाहर कैसे मिलेगा।
जो अंतरात्मा की आवाज़ सुनते हैं।
उन्हें शोर कैसे पसंद होगा।
जिसका न आदि है और न अंत।
जिसके कारण से हम हैं और तुम।

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वो एक ही है …
यत्र , तत्र , सर्वत्र।
अंतर्मन में बसा , उसे पहचानो।
शांत और शीतल मन से पुकारो।
वो सुनते हैं।
मौन मुख , बंद आँखें और दिल से उन्हें बुलाओ।
वो आते हैं।
सही मार्ग प्रदर्शित करते हैं।
प्रेरणा देते हैं।
कष्टों का निवारण करते हैं।
अपना आशीष देते हैं।
हर समस्या का हैं वो उपाय।
शांत और शीतल मन से बोलो।
ॐ नमः शिवाय.
ॐ नमः शिवाय .
मनो तो सब कुछ हैं।
और न मानो तो शून्य।
यही हैं जीवन का,
एक अनोखा मूल्य।

  – Ashish Kumar

अग्निवर्षा…


आज की सुबह कुछ अजीब थी।
जैसे सूरज मुरझाया हुआ।
नींद भरी आँखों से मैंने देखा।
सूरज की आँखें भी नम थी।
वो कुछ कहना चाहता था ,
शायद अपनी संवेदना बताना चाहता था।
जब तक मैं उन से कुछ पूछता।
अचानक बादलों का आगमन हुआ।
और सूरज बादलों में अद्रिश्य हुआ।
दिन भर काली घटा छायी रही।
बिन मौसम बरसात होती रही।
शाम होते होते सूरज की लालिमा फिर आयी।
पर उसकी चमक फिकी थी।
सूरज की आँखें भी नम थी।
तब मालूम हुआ मुझे की दिन भर बारिश क्यों हुई।
ये बारिश नहीं थी
बल्कि सूरज की आंसुओं की धरा थी …
जो धरती पर बह रही थी।

यकीन नहीं हुआ की सूरज भी रो सकता है।
अपनी संवेदना बयां कर सकता है i.
इसका कारण क्या हो सकता है ।
शायद …
मानव युक्त इस धरती पर।
मानवता शून्य हो रही है।
पशुओं में मानवता दिखाई दे रही है।
मानव ही मानव को खोखला बना रहा है।
धैर्य , समर्पण और विश्वास ख़त्म हो रही है।
अन्धविश्वास ने विश्वास को परास्त कर दिया है।
राखत से रंगीत ये दुनिया अब बन रही है।
बलात्कार और खून अब सामान्य हो गयी है।
हासिल तो बहुत किया इंसान ने।
पर क्या वो “इंसानियत ” हासिल कर पाया ?
सोचने की बात है अब …
क्या इस तरह इस संसार में इंसान रहेंगे ?
तो सूरज सच में रोयेगा और जब वो रोयेगा …
तो आंसू ज़रूर गिरेंगे …
और बारिश भी ज़रूर होगी .
पर थोड़ी अलग ,
जो होगी …
सूरज की “अग्निवर्षा।

 – Ashish Kumar

कोरोना, तांडव करो न…


दुनिया में आयी एक ऐसी महामारी |
हर जगह मच गयी त्राहि त्राहि |
मानव हो रहे बेचैन और परेशान |
एक सूख्म जीव ने कर दिया विश्व को हैरान |
खतरों से खेलने वाले आज खतरे में हैं |
लाखों लोग इस से प्रभावित हो रहे हैं |
कहते हैं इसे जग में कोरोरना |
अब और तांडव मत करो न |

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इस महामारी का अब तक कोई तोड़ नहीं |
कितनों को ले डूबेगी पता नहीं |
अचाननक शुरू हुई जुंग कब ख़त्म होगी ?
कोरोना से राहत कब मिलेगी ?
लाशों का अम्बार लगा दिया इसने |
इटली, स्पेन, इंग्लैंड और अमेरिका में |
समझ नहीं आ रहा ये सब क्यों हुआ ?
चीन से शुरू हुआ और विश्व को बर्बाद किया |
कौन ज़िम्मेदार है इस भयावह नज़ारे की |
लाशों का ढेर है खरीददार कोई नहीं |
ज़मीन काम पर रही लाशों को दफ़नाने में |
रूहें काँप रही हैं इस खौफनाक मंज़र में |
कहते हैं इसे जग में कोरोना |
अब और तांडव मत करो न |

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कुछ बुद्धिजीवों को इकॉनमी की पड़ी है |
लोग मर रहे हैं उनकी सुध नहीं है |
धंधे में नुक्सान की पड़ी है |
आर्थिक इस्थ्ती तो फिर से सुधर जाएगी |
इंसान बचेंगे तभी इकॉनमी रहेगी |
कालाबाज़ारी में मुनाफे की दुकान चला रहे हैं कुछ |
इंसानियत भूल कर अनाज का कत्लेआम कर रहे हैं कुछ |
लड़ाई लम्बी है और लड़ना है |
साथ मिल के इस जंग को जीतना है |
ईश्वर से यही प्राथना है …
कहते हैं इसे जग में कोरोना |
अब और तांडव मत करो न…

– Ashish Kumar

मैं रोया तो नहीं …


मौसम के अलग अलग मिज़ाज़ मे.
ज़िंदगी के हर उतार चढ़ाव मे.
औरों के घाव को मरहम लगते हुए.
और खुद के घाव पे नमक छिड़कते हुए.
मैं रोया तो नहीं पर आँसू निकल पड़े.
दिल ऐसा टूटा की टुकड़े भी ना मिले.

राहों मे अंधेरों का सामना करते हुए.
औरों के दुखों को मिटाते हुए.
खुद को खेलने का प्रयोगशाला बनाते हुए.
सब धोखों को झेलते हुए.
मैं रोया तो नहीं पर आँसू निकल पड़े.
बनावटी इस दुनिया मे हम अकेले पर गये.

शोर के इस वातावरण मे.
ज़िंदगी ने ज़हर ऐसा उगला.
मौत भी मुँह मोर कर चली गयी.
पर उस वक़्त मैं ना पिघला.
आँखों की लालिमा करती है कुछ इशारे.
दफ़ना दो उन ख्वाबों को जो नहीं हैं हमारे.
आवाज़ों के बाज़ारों मे खामोशी पहचानता कोई नहीं.
जो होना था वो हो गया बस अब और नहीं.
रह गया उस मंज़र और इस मंज़र मैं, अकेला.
चलो बनता हू इक दुनिया जो होगा रंगीला.
पर उस वक़्त…
मैं रोया तो नहीं पर आँसू निकल पड़े.
हम दिल पर पत्थर रख , किसी और दिशा चल दिए.

Ashish Kumar

कुछ करते हैं …


कुछ करते हैं |
ख्वाबों को हटा के |
ग़मों को भुला के |
नयी राह बना के |
ज़िन्दगी में आगे बढ़ते हैं |
चलो कुछ करते हैं |

कुछ करते हैं |
दुःख के पलों को चोर के |
अनचाही यादों को जला के |
किस्मत के मार को हरा के |
नयी रौशनी तलाशते हैं |
चलो कुछ करते हैं |

कुछ करते हैं |
दिल की आवाज़ सुन के |
दूसरों के दुखों को मिटा के |
अपने आप से बात कर के |
ज़िन्दगी का मज़ा लेते हैं |
चलो कुछ करते हैं |

कुछ करते हैं |
बिगड़ी किस्मत को बदल के |
ऐसी राह पकड़ते हैं |
तूफ़ान भी घबरा जाये |
ऐसा कुछ सोचते हैं |
मौसम के हर मिजाज को |
मुश्किलों को हरा के |
खुद पे भरोसा रख के |
विश्वास का दामन थाम के |
ज़िन्दगी से लरते हैं |
चलो कुछ करते हैं |
चलो कुछ करते हैं |

– Ashish Kumar