… मैं तो चलता गया |…


सब कुछ सवारते हुए |
खुद को सँभालते हुए |
मैं तो चलता गया |
पर मैं न रहा |

राहों में मुश्किलों को झेलते |
आँखों से आंसूं पीते |
होठों पे मुस्कराहट बनाये हुए |
मैं तो चलता गया |
पर मैं न रहा |
walk

कभी सुख को देख के |
कभी दुःख को झेल के |
अपने आप को भूल के |
मैं तो चलता गया |
पर मैं न रहा |

आवाज़ों के बाज़ारों में |
शोर के भवसागर में |
मेरी ख़ामोशी शांत हो गयी |
बोलूं तो बोलू क्या |
मेरी आवाज़ भी मुझसे नाराज़ हो गयी |
दुनिया की परछाई में |
खुद की परछाई भूल गया |
परन्तु …
मैं तो चलता गया |
पर मैं न रहा |

एक राह पकड़ी ऐसी |
जिस पर इंसान ने कदम ही न रखे थे |
उस अंजानी और अजनबी राह में |
मंज़िल तलाश लिया |
औरो की क्या बात करे |
खुद को ही अपना शागिर्द बना लिया |
अकेले ही रहकर |
अकेलेपन को मार डाला |
पर …
मैं तो चलता गया |
पर मैं “मैं” न रहा |

अँधेरा आया और गया |
पर सवेरा नहीं हुआ |
आने और जाने का चक्र चलता रहेगा |
मैं था , मैं हूँ |
राह कठिन है बहुत |
अंगारों पर चलना होगा |
मुश्किलों को मारने के लिए |
खुद से जीतना होगा |
सवेरा लाने के लिए |
खुद को सूरज की तरह जलना होगा |
डगर मुश्किल है नामुमकिन नहीं |
इसलिए …
मैं तो चलूँगा |
और चलता रहूँगा | 

walk1  – Ashish kumar

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