जज़्बात


जज़्बात कभी हालात ने बदले,

तो कभी मुलाकात ने बदले।

जज़्बात कभी रात के अंधियारों ने बदले,

तो कभी जीवन के अंधकार ने बदले।

कभी आग की लपटों में जज़्बात जल गए,

तो कभी दिल की आग में धुआं बन उड़ गए।

शाम ढलते कभी दिल के कब्र में चले गए,

तो कभी भोर होते वापस दिल में बस गए।

जज्बात कभी कोहरा बन उड़ गए,

तो कभी अश्रुओं की बारिश में बह गए।

जज़्बात कभी हालात ने बदले,

तो कभी मुलाकात ने बदले।

दिलवालों की बस्ती में कभी दिल ही न मिले।

फिर इंसान का दिल भगवान या खुदा से कैसे मिले?

क्या थे और क्या से क्या हो गए।

कभी दूध और पानी के प्यासे थे,

अब खून के प्यासे हो गए।

इतने रंग बदले कि बेरंग हो गए,

जज़्बात अब कागज़ में ही गुम हो गए।

जज़्बात अब कागज़ में ही गुम हो गए।

Ashish Kumar

समय है कम…


समय है कम,
काम है बहुत ज़्यादा।
कैसे पूरा होगा ?
खुद से किया वादा।
जीवन के उतार चढाव में ,
इधर उधर भटकना।
रुकने का अब नाम नहीं ,
सिर्फ चलते रहना।
समय है कम ,
मुश्किलें है ज़्यादा।
कैसे पूरा होगा ?
खुद से किया वादा।
एक लौ जलाई है ,
जो बुझेगी नहीं।
आँधी, बारिश या तूफ़ान ही सही,
अब रुकेगी नहीं।
है ताकत इतनी इस चिंगारी में।
कभी पानी में आग लगाती,
तो कभी राख को जलाती है।
बेवक़्त , लगातार वो,
अब जल रही है।
समय है कम ,
काम है बहुत ज़्यादा।
कैसे पूरा होगा ?
खुद से किया वादा।

Ashish Kumar

मानो तो सब कुछ है …


मानो तो सब कुछ है …
और न मानो तो शून्य।
यही है जीवन का,
एक अनोखा मूल्य।
ढूंढने की ज़रुरत नहीं।
पहचानने की आवश्यकता है।
अपने अंदर छिपे इस “परम सत्य ” को।
अनुभव करने की आवश्यकता है।
जग घूमने की ज़रुरत नहीं।
कण कण में वो बस्ते हैं।
एक बार झाँक कर तो देखो।
दिल , दिमाग और मन में वो निवास करते हैं।
उन्हें पाना कठिन नहीं पर।
कठिन तरीके अपनाते हैं लोग।
विधि , विधान और आडम्बर की ज़रुरत नहीं।
फिर भी दिखावा और आडम्बर करते हैं लोग।
जो मन के भीतर हैं।
वो बाहर कैसे मिलेगा।
जो अंतरात्मा की आवाज़ सुनते हैं।
उन्हें शोर कैसे पसंद होगा।
जिसका न आदि है और न अंत।
जिसके कारण से हम हैं और तुम।

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वो एक ही है …
यत्र , तत्र , सर्वत्र।
अंतर्मन में बसा , उसे पहचानो।
शांत और शीतल मन से पुकारो।
वो सुनते हैं।
मौन मुख , बंद आँखें और दिल से उन्हें बुलाओ।
वो आते हैं।
सही मार्ग प्रदर्शित करते हैं।
प्रेरणा देते हैं।
कष्टों का निवारण करते हैं।
अपना आशीष देते हैं।
हर समस्या का हैं वो उपाय।
शांत और शीतल मन से बोलो।
ॐ नमः शिवाय.
ॐ नमः शिवाय .
मनो तो सब कुछ हैं।
और न मानो तो शून्य।
यही हैं जीवन का,
एक अनोखा मूल्य।

  – Ashish Kumar

नीती में राजनीति |


वहाँ जल रहे हैं अरमान रात और दिन.
वो कहते हैं की करेंगे काम एक दिन.
यहाँ हर जगह अंधियारा है.
अंदर और बाहर कष्टों का बसेरा है.
क्या करेंगे लोग इस बहार में.
यहाँ लोग जी रहें आँसुओं की बहार में .
जल गये शमशान मे लुटा के सब कुछ.
सब खो दिया अब बचा नही कुछ.
यहाँ कदम कदम पर उन्नति की बात होती है.
नेता अभिनेता बन कर अपनी रोटियाँ सेक्ते हैं.
और लोग आँसुओं से दिए जला कर जीते हैं.
नीति तो बनी पर उसपे राजनीति क्यूँ हुई.
ऐसी इस्थति पैदा ही क्यूँ हुई???

वो कहते हैं ग़रीबी हटाएँगे.
खुशहाली और मुस्कुराहट लाएँगे.
जो रोशनी मे जीते हैं उन्हे अंधेरा कैसे समझ आएगा?
रोटी ना मिलने का दर्द कैसे पता चल पाएगा?
जिन पर बीती है उनसे पूछो भूख क्या होती है.
बिना सब्ज़ी के पानी से रोटी कैसे खाते हैं?
हद तो तब होती है जब पानी भी ना मिले.
भूख मिटाने को…
आँसू के साथ ही रोटी खा लेते हैं.
आज़ाद तो हो गये पर आज़ादी मिली कहाँ?
भूख से मरते हुए अब भी हैं लोग यहाँ.
हर गली, नुक्कड़ चौराहों पर नज़र डालो.
कुछ वक़्त निकाल कर ज़रा इन्हे भी संभलो.
देख रहा हूँ मैं ये नज़ारा कई वर्षों से.
हर रोज़ लोग मरते हैं भूख से.
इतने वादे इतने कदम कहाँ रह जाते हैं.
समझ नहीं आता ये भूख से लोग मरते ही जाते हैं.
इन्हें कपड़े नहीं हैं तन ढकने को.
ठंड से तिठुरते…
ढक लेते है पेट अपने पाँव से.
नीति बनाने वालो कहाँ है वो नीति?
सच तो ये है…
यहाँ नीति मे राजनीति चलती है.
पिसते हैं बुज़ुर्ग और गारीद पर इनकी रोटियाँ सिकटी हैं.
दुख होता ये जान कर.
नीति तो बनी पर उसपे राजनीति क्यूँ हुई.
ऐसी इस्थति पैदा ही क्यूँ हुई???

– Ashish Kumar

मैं रोया तो नहीं …


मौसम के अलग अलग मिज़ाज़ मे.
ज़िंदगी के हर उतार चढ़ाव मे.
औरों के घाव को मरहम लगते हुए.
और खुद के घाव पे नमक छिड़कते हुए.
मैं रोया तो नहीं पर आँसू निकल पड़े.
दिल ऐसा टूटा की टुकड़े भी ना मिले.

राहों मे अंधेरों का सामना करते हुए.
औरों के दुखों को मिटाते हुए.
खुद को खेलने का प्रयोगशाला बनाते हुए.
सब धोखों को झेलते हुए.
मैं रोया तो नहीं पर आँसू निकल पड़े.
बनावटी इस दुनिया मे हम अकेले पर गये.

शोर के इस वातावरण मे.
ज़िंदगी ने ज़हर ऐसा उगला.
मौत भी मुँह मोर कर चली गयी.
पर उस वक़्त मैं ना पिघला.
आँखों की लालिमा करती है कुछ इशारे.
दफ़ना दो उन ख्वाबों को जो नहीं हैं हमारे.
आवाज़ों के बाज़ारों मे खामोशी पहचानता कोई नहीं.
जो होना था वो हो गया बस अब और नहीं.
रह गया उस मंज़र और इस मंज़र मैं, अकेला.
चलो बनता हू इक दुनिया जो होगा रंगीला.
पर उस वक़्त…
मैं रोया तो नहीं पर आँसू निकल पड़े.
हम दिल पर पत्थर रख , किसी और दिशा चल दिए.

Ashish Kumar