Shayari – 12


हस्ते चेहरे देखकर,  मैंने भी हसने का सोचा।

चल पड़ा मुस्कान खरीदने,  बनावटी मुस्कुराहट के बाजार में।

मालूम नहीं था सच्ची मुस्कुराहट मिलती नहीं।

– Ashish Kumar

Shayari – 11


मुस्कुराहट की दुनिया में मुस्कुराहट खरीदने चला था मैं।
मुस्कुराहट तो मिली नहीं …
और मैंने सबसे मंहगी “ख़ामोशी “ खरीद ली ।

 – Ashish Kumar

Shayari – 10


विडंबना है मानव निर्मित दुनिया की।

विडंबना है मानव निर्देशित दुनिया की।

मानव रहित जग में मानवता शून्य हो रही है।

इंसानों में इंसानियत होना एक स्वपन हो गई है।

प्रतिस्पर्धा के इस दौर में इंसान बहुत आगे निकल गए।

अफ़सोस सिर्फ इतना है …

मानवता और इंसानियत पीछे छोर गए |

– Ashish Kumar

Shayari – 9


कोरोना के इस काल में …
ज़िन्दगी तबाह हो रही पर कब तक, ये पता नहीं।
कितनी दूर तलक जाएगी ये त्रासदी, मालूम नहीं।
बस यही कहना चाहता हूँ …
धीरज धार , खुद पे विश्वास रख।
ये दिन भी कटेंगे , हम जीतेंगे और जीतकर बाहर आएंगे।
हम फिर से एक बार मुस्कुरायेंगे।
हम फिर से एक बार मुस्कुरायेंगे।

– Ashish Kumar

Shayari – 8


इंसान इंसान का नहीं होता।

इसलिए तो हर कदम पर वो है रोता।

ये दुनिया है एक ऐसा बाज़ार।

जहां सबकुछ होता है तार – तार।

Ashish Kumar

Note: This is an extract from my Hindi poem titled, Bazar. The full poem can be read here