थोड़ा तुम बताओ , थोड़ा मैं बताऊँ |


उस कली की बात मैं क्या बताऊँ |
उस मुस्कान की खूबसूरती क्या बताऊँ |
वो जो करती है अपनी ज़ुल्फ़ों से नखरे |
उस हाज़िर जवाब इंसान की दास्ताँ क्या बताऊँ |
जो मिली नसीब से , उस संजीवनी की व्याख्या क्या बताऊँ |
दिल में बस गयी और साँसों में समां गयी |
उस नाचीज़ की हाल -ऐ -दास्ताँ मैं क्या बताऊँ |ख़याल आता है मुझे अब तेरा हर वक़्त |
जिंगदी थम सी गयी है बेवक़्त |
वो क्या जादू है तुझमे जिसमे मैं फिसल गया |
तुम्हारे ख्यालों में मैं बस गया |
तेरे होटों की मुस्कराहट कहती है कुछ और |
ज़ुबान पर बोल बोलती है तू कुछ और |
दिल में तेरे कुछ चल रहा है |
क्या वो मेरे लिए धड़क रहा है ?
रख कर दिल पर हाथ एक बार सोचो |
अपने आप से मेरे बारे में पूछो |
जो तेरे दिल में बस्ता है…
जो मेरे दिल में बस्ती है…
थोड़ा तुम बताओ , थोड़ा मैं बताऊँ |
थोड़ा तुम बताओ , थोड़ा मैं बताऊँ |
अब कली से तुम फूल बन जाओ …
अब कली से तुम फूल बन जाओ …

Ashish Kumar

नीती में राजनीति |


वहाँ जल रहे हैं अरमान रात और दिन.
वो कहते हैं की करेंगे काम एक दिन.
यहाँ हर जगह अंधियारा है.
अंदर और बाहर कष्टों का बसेरा है.
क्या करेंगे लोग इस बहार में.
यहाँ लोग जी रहें आँसुओं की बहार में .
जल गये शमशान मे लुटा के सब कुछ.
सब खो दिया अब बचा नही कुछ.
यहाँ कदम कदम पर उन्नति की बात होती है.
नेता अभिनेता बन कर अपनी रोटियाँ सेक्ते हैं.
और लोग आँसुओं से दिए जला कर जीते हैं.
नीति तो बनी पर उसपे राजनीति क्यूँ हुई.
ऐसी इस्थति पैदा ही क्यूँ हुई???

वो कहते हैं ग़रीबी हटाएँगे.
खुशहाली और मुस्कुराहट लाएँगे.
जो रोशनी मे जीते हैं उन्हे अंधेरा कैसे समझ आएगा?
रोटी ना मिलने का दर्द कैसे पता चल पाएगा?
जिन पर बीती है उनसे पूछो भूख क्या होती है.
बिना सब्ज़ी के पानी से रोटी कैसे खाते हैं?
हद तो तब होती है जब पानी भी ना मिले.
भूख मिटाने को…
आँसू के साथ ही रोटी खा लेते हैं.
आज़ाद तो हो गये पर आज़ादी मिली कहाँ?
भूख से मरते हुए अब भी हैं लोग यहाँ.
हर गली, नुक्कड़ चौराहों पर नज़र डालो.
कुछ वक़्त निकाल कर ज़रा इन्हे भी संभलो.
देख रहा हूँ मैं ये नज़ारा कई वर्षों से.
हर रोज़ लोग मरते हैं भूख से.
इतने वादे इतने कदम कहाँ रह जाते हैं.
समझ नहीं आता ये भूख से लोग मरते ही जाते हैं.
इन्हें कपड़े नहीं हैं तन ढकने को.
ठंड से तिठुरते…
ढक लेते है पेट अपने पाँव से.
नीति बनाने वालो कहाँ है वो नीति?
सच तो ये है…
यहाँ नीति मे राजनीति चलती है.
पिसते हैं बुज़ुर्ग और गारीद पर इनकी रोटियाँ सिकटी हैं.
दुख होता ये जान कर.
नीति तो बनी पर उसपे राजनीति क्यूँ हुई.
ऐसी इस्थति पैदा ही क्यूँ हुई???

– Ashish Kumar

मैं रोया तो नहीं …


मौसम के अलग अलग मिज़ाज़ मे.
ज़िंदगी के हर उतार चढ़ाव मे.
औरों के घाव को मरहम लगते हुए.
और खुद के घाव पे नमक छिड़कते हुए.
मैं रोया तो नहीं पर आँसू निकल पड़े.
दिल ऐसा टूटा की टुकड़े भी ना मिले.

राहों मे अंधेरों का सामना करते हुए.
औरों के दुखों को मिटाते हुए.
खुद को खेलने का प्रयोगशाला बनाते हुए.
सब धोखों को झेलते हुए.
मैं रोया तो नहीं पर आँसू निकल पड़े.
बनावटी इस दुनिया मे हम अकेले पर गये.

शोर के इस वातावरण मे.
ज़िंदगी ने ज़हर ऐसा उगला.
मौत भी मुँह मोर कर चली गयी.
पर उस वक़्त मैं ना पिघला.
आँखों की लालिमा करती है कुछ इशारे.
दफ़ना दो उन ख्वाबों को जो नहीं हैं हमारे.
आवाज़ों के बाज़ारों मे खामोशी पहचानता कोई नहीं.
जो होना था वो हो गया बस अब और नहीं.
रह गया उस मंज़र और इस मंज़र मैं, अकेला.
चलो बनता हू इक दुनिया जो होगा रंगीला.
पर उस वक़्त…
मैं रोया तो नहीं पर आँसू निकल पड़े.
हम दिल पर पत्थर रख , किसी और दिशा चल दिए.

Ashish Kumar

कुछ करते हैं …


कुछ करते हैं |
ख्वाबों को हटा के |
ग़मों को भुला के |
नयी राह बना के |
ज़िन्दगी में आगे बढ़ते हैं |
चलो कुछ करते हैं |

कुछ करते हैं |
दुःख के पलों को चोर के |
अनचाही यादों को जला के |
किस्मत के मार को हरा के |
नयी रौशनी तलाशते हैं |
चलो कुछ करते हैं |

कुछ करते हैं |
दिल की आवाज़ सुन के |
दूसरों के दुखों को मिटा के |
अपने आप से बात कर के |
ज़िन्दगी का मज़ा लेते हैं |
चलो कुछ करते हैं |

कुछ करते हैं |
बिगड़ी किस्मत को बदल के |
ऐसी राह पकड़ते हैं |
तूफ़ान भी घबरा जाये |
ऐसा कुछ सोचते हैं |
मौसम के हर मिजाज को |
मुश्किलों को हरा के |
खुद पे भरोसा रख के |
विश्वास का दामन थाम के |
ज़िन्दगी से लरते हैं |
चलो कुछ करते हैं |
चलो कुछ करते हैं |

– Ashish Kumar

अच्छा लगता है.


वो तुम्हारा अचानक से चले जाना.
जाके फिर वापस आना.
नुका छुपी खेल के मुझे सतना.
मुझसे नाराज़ हो कर मुझे रुलाना.
अच्छा लगता है.
बहुत अच्छा लगता है.

वो तुम्हारा गुस्से से मुस्कुराना.
दिल मे मेरे हमेशा के लिए बस जाना.
सुबह शाम होने का एहसास दिलाना.
हमेशा के लिए मेरा हो जाना.
अच्छा लगता है.
बहुत अच्छा लगता है.

तुम्हारी धड़कानों मे मेरा होना.
होठों का अचानक से सिसकना.
दिल की बात दिल मे रखना.
ज़ुबान से कुछ ओर ही कहना.
अच्छा लगता है.
बहुत अच्छा लगता है.

छोर दिया है मैने सब कुछ.
तुम ही हो मेरा अब सब कुछ.
साथ ना छोड़ूँगा तुम्हारा.
बस मेरी हो के रहना.
वो तुम्हारा आँखों से इशारा करना.
कभी घूर के मुझे देखना.
तुमसे बात करना, तुम्हे सतना.
तुम्हारी यादों मे खोए रहना.
अच्छा लगता है.
अच्छा लगता है.

– Ashish Kumar

सच्चे दिल से |


कल तुम्हे देखा था मैने |
कुछ इस नज़र से |
जैसे चाहने लगा हूँ तुम्हे |
सच्चे दिल से |
तुम्हारे चेहरे से झलकती मासूमियत |
मुझे खींचती है तुम्हारी ओर |
तुम्हारे होठों का सिसकना |
मुझे ले जाता है तुम्हारी ओर |
भूल जाता हूँ मैं सारे ग़म |
मैं और तुम अब बन जाए “हम” |

चेहरे पे असमंजस है ,
पर दिल मे कुछ और है |
ज़बान कुछ कहती है ,
पर आँखों मे कुछ और ही है |
साफ झलकता है प्यार ,
तुम्हारी आँखों से |
होठों की कश्मकश वो बताती है,
जो महसूस करती हो तुम…
अपने दिल की धड़कनो मे |

जब तुम पास रहती हो,
अछा लगता है |
दूर जाने की बात करके तुम,
मुझे क्यूँ सताती हो |
रूको कहो अपने दिल की |
सुन लो कुछ…
मेरे भी दिल की |
तुम्हारी नज़र कहती है,
मैं तुम्हारा हूँ |
मैं कहता हूँ की…
तुम मेरी हो |
तुम चाहती हो इस कदर से |
पर रोकती हो दिल को अपनी ज़ुबान से |
अब खेलना बंद करो |
कहना है जो सो कह दो |
रोको न खुद को मुझसे |
क्यूंकी…
चाहता हूँ मैं तुम्हे |
सच्चे दिल से…
सच्चे दिल से…

– Ashish Kumar

लिखते जा |


कुछ लिखने का जी करता है |
क्या लिखूं समझ नहीं आता है |
काम करते करते तन और मन थक जाता है |
फिर भी दिल लिखने को कहता है |
दिल को कैसे समझाऊं जो हर वक़्त धड़कता है |
पर तन और मन आराम करना चाहता है |
मन कहता है सो जा |
दिल कहता है लिखते जा…

writer2

समय का चक्र तो हमेशा चलता है |
पर मनुष्य का जीवन तो रुकता है |
ज़िंदगी मे कई लोगों से मिलना होता है |
पर लिखने के लिए खुद से बात करना परता है |
लिखकर अत्यंत आनंद प्राप्त होता है |
लिखने के बाद मन भी खुश हो जाता है |
पर फिर भी ये लिखने से रोकता है |
मन कहता है सो जा  |
पर दिल कहता है लिखते जा |
और लिखते जा …

 – Ashish Kumar