जज़्बात


जज़्बात कभी हालात ने बदले,

तो कभी मुलाकात ने बदले।

जज़्बात कभी रात के अंधियारों ने बदले,

तो कभी जीवन के अंधकार ने बदले।

कभी आग की लपटों में जज़्बात जल गए,

तो कभी दिल की आग में धुआं बन उड़ गए।

शाम ढलते कभी दिल के कब्र में चले गए,

तो कभी भोर होते वापस दिल में बस गए।

जज्बात कभी कोहरा बन उड़ गए,

तो कभी अश्रुओं की बारिश में बह गए।

जज़्बात कभी हालात ने बदले,

तो कभी मुलाकात ने बदले।

दिलवालों की बस्ती में कभी दिल ही न मिले।

फिर इंसान का दिल भगवान या खुदा से कैसे मिले?

क्या थे और क्या से क्या हो गए।

कभी दूध और पानी के प्यासे थे,

अब खून के प्यासे हो गए।

इतने रंग बदले कि बेरंग हो गए,

जज़्बात अब कागज़ में ही गुम हो गए।

जज़्बात अब कागज़ में ही गुम हो गए।

Ashish Kumar

बात


बात सिर्फ इतनी है, कि बात कुछ भी नहीं।

बस यही बात है, जो मुसीबत की जड़ है।

इसी बात में, गौण हो रहे जज़्बात।

मालूम नहीं कैसे, बिगड़ जाते हालात।

बात सिर्फ इतनी है, कि बात कुछ भी नहीं।

हमारी सब सुने, पर हम किसी की नहीं।

अहंकार में लिप्त हुई, इंसान की सोच।

अपनापन हमदर्दी छोड़, हो रहे सब मदहोश।

बात सिर्फ इतनी है, कि बात कुछ भी नहीं।

कहते हैं जिसे इंसान, पर वो इंसान नहीं।

मानव निर्मित हथियार और मिसाइल ने,

सिर्फ मानव को ही मारा।

कितने घर किए बर्बाद, और कितनों को उजाड़ा।

इस कदर बार बार, मानवता को ही मारा।

हमने मिसाइल तो बनाया, पर “मिसाल” कब बनेंगे?

इस अंधे दौड़ से, बाहर कब निकलेंगे?

बात सिर्फ इतनी है, कि बात कुछ भी नहीं।

मैं ही सिर्फ सत्य हूं, और बाकी कुछ नहीं।

असल सत्य जो है वो “मैं” नहीं,

और “मैं” जो है वो सत्य नहीं।

यही बात है जो समझनी है।

बात सिर्फ इतनी है, कि बात कुछ भी नहीं।

बात सिर्फ इतनी है, कि बात कुछ भी नहीं।

Ashish Kumar

आँखे देखें सब सत्य…


आँखे देखें सब सत्य , पर मन मैला हो जाये।
इस मलीन मन को अब , कौन कैसे जलाये ?


ज़िन्दगी के समर में , आग उगलता इंसान।
इस आग में आखिर जल रहा , सिर्फ और सिर्फ इंसान।
शून्य हुआ संसार , मानव के बाजार में।
मिट रही मानवता , मानव निर्मित संसार में।
थम गयी है ज़िन्दगी , आज के इस दौर में।
सांसे रूकती जा रही , इस प्रदूषित अंधकार में।
सत्य स्वीकार्य नहीं , इस दूषित समाज में।
सब खुद ही सत्य हैं , इस अनोखे दौर में।
सब कुछ पाया हमने , इस भौतिक दुनिया में।
खोया तो सिर्फ इंसानियत , इंसानो की दुनिया में।
हंसी , ख़ुशी और अपनापन , सब लिप्त हो रही।
संघर्ष के इस काल में , आँखें मूँद हो रही।


फिर भी हम हैं आज , खुद को कुछ बदलना होगा।
इस नयी चुनौती से , अब मिलकर निपटना होगा।
मलीन मन को अब , दूषित नहीं करना है।
जो गलती जिससे हुई सो हुई , अब उठना है और बढ़ना है।
इस मंज़र को बदलना है , अब भी वक़्त है।
अंतर्मन की आवाज़ से , साथ मिलकर लड़ना है।
ज़रूरी है इस सत्य को समझने की …
आँखें देखे सब सत्य , पर मन मैला हो जाये।
इस मलीन मन को अब , कौन किसे जलाये ?

-Ashish Kumar

समय है कम…


समय है कम,
काम है बहुत ज़्यादा।
कैसे पूरा होगा ?
खुद से किया वादा।
जीवन के उतार चढाव में ,
इधर उधर भटकना।
रुकने का अब नाम नहीं ,
सिर्फ चलते रहना।
समय है कम ,
मुश्किलें है ज़्यादा।
कैसे पूरा होगा ?
खुद से किया वादा।
एक लौ जलाई है ,
जो बुझेगी नहीं।
आँधी, बारिश या तूफ़ान ही सही,
अब रुकेगी नहीं।
है ताकत इतनी इस चिंगारी में।
कभी पानी में आग लगाती,
तो कभी राख को जलाती है।
बेवक़्त , लगातार वो,
अब जल रही है।
समय है कम ,
काम है बहुत ज़्यादा।
कैसे पूरा होगा ?
खुद से किया वादा।

Ashish Kumar

गणतंत्र में षड़यंत्र …



Top post on IndiBlogger, the biggest community of Indian Bloggers

ये किसने रचाया है षड़यंत्र ऐसा।
क्यों न कहें इसे “गणतंत्र” से धोखा।
इरादें हैं इनके, हिंसा और अराजक होना।
“तंत्र” के नाम पर “लोकतंत्र” तोड़ना।
गण को शर्मसार करके “जन – गण ” तोड़ना।
लाठी , तलवार , भाले और फरसे से
टैगोर की ” जन – गण – मन ” छेदना।
ये कैसी है त्रासदी ?

इसी ख़ाक में मिली है अनगिनत हस्ती।
पावन है ये, वो भारत की धरती।
मिली जहाँ ख्वाजा , राम और रहीम की भक्ति। 
गुंजी यहीं थी, श्री कृष्ण की बंसी।
ये वो ही है ज़मीन।
नानक के “इक ओंकार ” की ,
गोविन्द सिंह के शौर्य और बलिदान की ,
ये वो ही है ज़मीन।
स्वामी विवेकानंद के धार्मिक ज्ञान की।
महर्षि दयानन्द के “सत्यार्थ प्रकाश ” की।
दुनिया ने माना जिसे ” गौतम की धरती”।
ये वही है सरज़मीं।

 

अहिंसा का पुजारी , कहते हैं हम गाँधी।
झुकाया था जिसने , अंग्रेज़ों की आँधी।
एक भारत कहते हैं जिसे हम, वो है प्यारा।
बनाया था जिसने , वो “सरदार ” हमारा।
“जय जवान जय किसान ” कहने वाला।
वो देश का अपना, “लाल” हमारा।
सिर्फ यादें हैं उनकी यहीं।

आज़ाद ” और “भगत ” ने धोखा नहीं किया।
मौत गले लगाया  पर सौदा नहीं किया।
ये वो ही तो है धरती।
एक शोला जलाया था , आज़ादी का मतवाला।
“आज़ाद हिन्द फौज” था “सुभाष” ने बनाया।
पावन है ये धरती।
सुखदेव, राजगुरु, बिस्मिल और अशफ़ाक़।
न जाने ऐसे कितनों को हमने गंवाया।
इसी ख़ाक में सब मिले।
कहते हैं जिसे “हिन्द “, वो हिंदुस्तान यही है।
“नेहरू ” की बाबस्ता, गुलिस्तां यही है।
ये वो ही तो है ज़मीन।
ये वीरों की है सरज़मीं।

पावन है ये वो भारत की धरती।
जन्मी जहाँ थी , अहिंसा की शक्ति।
फिर कैसी आज शामत है आयी।
भारत ने अपनी इज़्ज़त गंवाई।
है कौन वो, जिसने चीड़ा “भारत के हृदय ” को,
कि “लाल ” कर दिया जिसने, “लाल किले ” की प्राचीर को।
जवानों के रक्त से, खूनी ये दहशत।
हुड़दंग मचाया था जिसने , किसकी है वेह्शत ?
इनके इरादे तो अच्छे नहीं …
कि मारा है इन्होने तीर,
भारत के कलेजे पर।
दाग लगाया है , हिन्द की “तस्वीरों” पर।
इनकी माफ़ी तो अब, बनती नहीं …
कि “तिरंगे ” को गिराया है आज यहां जिसने ।
जिसकी रक्षा में हो गए “शहीद ” जवान कितने।
इन्हें तो ये मालूम ही नहीं।
लहराया है “फ़र्ज़ी ध्वज” आज जिसने यहाँ पर।
गिरना पड़ा जब “जवानों ” को, “खाई ” में जा कर।
ऐसा मंज़र न देखा कभी …
कौन है वो पागल, कौन हैं वो गुंडे ?
चलाते हैं बेशर्मी,  “तिरंगे ” पे डंडे।
इन्हें शर्म तो आती नहीं …
और राजनीती करते हैं, ये नेता ये दरिंदे।
माँ- भारती को बेच के, चलाते हैं धंधे।
इन्हें शर्म तो आती नहीं …
बेशर्मी की हद है यही …

गणतंत्र के अवसर पे, ये “षड़यंत्र ” कैसा ?
आंदोलन के नाम पे ये “हुड़दंग ” कैसा ?
ये मंज़र तो अच्छी नहीं …
गलती नहीं, “गुनाह ” किया जिसने।
अपने वतन को, “दागी ” किया किसने ?
छिपे हैं यहीं पर यहीं | 
भड़काया है जिसने भी, हिन्द के अमन को।
गिराया है जिसने भी, भारत के चमन को।
छिप कर बैठे हैं, यहीं पर यहीं … 
कि सवाल है एक आज , भारत के मन में ।
पनाह दे दें उन्हें अब , क्यों न “कफ़न ” में ???
ये मंज़र अब बर्दाश्त नहीं …
गुनहगारों को अब माफ़ी न करना।
गद्दारे वतन को अब न छोड़ना।
क्यूँकि …
बहुत हुआ, अब “बस” भी होना चाहिए।
गणतंत्र के अवसर पर, “षड़यंत्र ” नहीं होना चाहिए।

 – Ashish Kumar