अमिट छाप…


भूल कर जिसे हमने भूला, फिर याद आए आप।

जिंदगी की इस डाली पर, छोड़ गए अमिट छाप।

मौसम के मिजाज़ को बदलने की कोशिश कभी हमने भी की थी।

आग लगाकर जाने वाले, आग बुझाने की कोशिश हमने की थी।

आग तो बुझ गई पर तपिश बरक़रार है।

जो दर्द दिया था आपने , वो आज भी सहज बरक़रार है |

मौसम बदला , हम भी बदले पर न बदले आप।

भूल कर जिसे हमने भूला, फिर याद आए आप।

जिंदगी की इस डाली पर, छोड़ गए अमिट छाप।

Ashish Kumar

15 thoughts on “अमिट छाप…

  1. मैं बस भूलना चाहता हूँ पर ये विस्मृति मेरे पास क्यों नहीं आ रही है। मैं इसे पाने की कोशिश कर रहा हूं लेकिन जब मैं आपको भूल जाऊं तो कृपया मुझे दोष न दें। बहुत अच्छी कविता आपने लिखी है आशीष जी

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