कई बार उठ खड़े हो गए।


कभी  आग  से  जले , तो  कभी  राख  में  मिले। 
हम  तो  गिरकर  भी , कई  बार  उठ  खड़े  हो  गए। 
पलकों  पर  बैठाये  सपने , दिल  में  जगी  आस। 
राह  पकर चलते  गए , बुझ  न  पायी  प्यास। 
कभी  धुंध  में  खो  गए , तो  कभी  याद   बनकर रह  गए। 
हम  तो  गिर  कर  भी , कई  बार  उठ  खड़े  हो  गए। 
अंधेरों  में  रौशनी  तलाशते , हम  तो  थक  गए। 
न  रुके  कभी , न  झुके  कभी , हम  फिर  शुरू  हो  गए। 
कभी  उजाले  में  खो  गए , तो  कभी  रात  भर  जग  गए।  
हम  तो  गिरकर  भी , कई  बार  उठ  खड़े  हो  गए। 
आस्तीन  को  झेलते , उसका  ज़हर  भी  पी गए। 
विश्वास  तोड़ने  वालों  को , बस  हम  भूलते  गए। 
अपनी  धुन  में  लग  कर , बस  कर्म  करते  गए। 
कभी  आग  से  जले , तो  कभी  राख  में  मिले। 
हम  तो  गिरकर  भी , कई  बार  उठ  खड़े  हो  गए। 
हम  तो  गिरकर  भी , कई  बार  उठ  खड़े  हो गए। 

- Ashish Kumar

44 thoughts on “कई बार उठ खड़े हो गए।

  1. ज़िन्दगी के सब से बडा सच 🌷🙏👍🏻 हम हर हर क्षण इसी तरह ज़िन्दगी के मोट पर खड़े होकर
    आशा और निराश के साथ जी रहे है , भरोसा एक ही हमारे संपन्नता है 👌😊 बधाई हो 🙏

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  2. Lokesh Sastya

    “हम तो गिरकर भी कई बार उठ खड़े हो गए।” इस पंक्ति में विशेष आकर्षण, स्वीकारने की भावना और एक अपनापन छुपा हुआ है। जो सब में नहीं होती है। गिरना-गिराना तो चलता रहता है, पर “फिर से उठने” का जज्बा हम में होना चाहिए।

    “कई बार उठ खड़े हो गए”, के लिए आपको ह्रदय से धन्यवाद, आशीष भैया। 👏👏

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  3. इसे हीं हौसला कहते हैं। ज़िंदगी यही सिखाती है। गिरना और सम्भालना। ख़ूबसूरतअभिव्यक्ति।

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