शाम ढले एक बात चली है…


शाम  ढले  एक  बात  चली  है। 
कागज़  पर  कलम, फिर  एक  बार  चली  है। 

ज़िन्दगी  तो  ज़िन्दगी  है , वो  चल  रही  है। 
सुख  हो  या  दुःख , आगे  बढ़  ही  रही  है। 
गिरते  गिरते  संभालना , उठ कर  फिर  चलना। 
मुसीबत  को  दफना  कर  युहीं  चलना। 
यही कोशिश  हर  वक़्त  हो  रही  है। 
राह  में  कांटो  की  आंधी  हो  चली  है। 
इस  आंधी  में  धूप, फिर  एक  बार  खिली  है। 
शाम  ढले  एक  बात  चली  है।  
कागज़  पर  कलम , फिर  एक  बार  चली  है। 

अंतर्मन  की  शक्ति  पहचान  कर। 
मौसम  का  बदले  मिज़ाज़  को  भांप  कर। 
कारवां  बढ़  रही  है। 
कभी  आसमान  तो  कभी  आँखों  से  बारिश  हो  रही  है। 
और  ज़िन्दगी  यूँ  ही  चल  रही  है। 
लाख  दुआ  लाख  कोशिश  शायद  ही  काम  आती  है। 
जब  इरादे  नेक  हो  तो  मंज़िल  मिल  ही  जाती  है। 
इस  मंज़िल  को  पाने  की  ललक  ज़रूरी  है। 
हर  सुबह  एक  नयी  किरण  लाती  है। 
आँखों  की  बारिश  को  मिटाती  है। 
यही  बात  तो  समझनी  है। 
ज़िन्दगी  है  और  इसमें , 
उम्मीद  की  कलि  फिर  एक  बार  खिलनी  है। 
शाम  ढले  एक  बात  चली  है। 
कागज़  पर  कलम , फिर  एक  बार  चली  है। 
कागज़  पर  कलम , फिर  एक  बार  चली  है।  

- Ashish Kumar
PC: Google

52 thoughts on “शाम ढले एक बात चली है…

  1. Brilliantly beautiful Ashish, deep n lovely. Especially these lines ❤🙏🙏

    ज़िन्दगी तो ज़िन्दगी है , वो चल रही है। सुख हो या दुःख , आगे बढ़ ही रही है। गिरते गिरते संभालना , उठ कर फिर चलना।

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