नीती में राजनीति |


वहाँ जल रहे हैं अरमान रात और दिन.
वो कहते हैं की करेंगे काम एक दिन.
यहाँ हर जगह अंधियारा है.
अंदर और बाहर कष्टों का बसेरा है.
क्या करेंगे लोग इस बहार में.
यहाँ लोग जी रहें आँसुओं की बहार में .
जल गये शमशान मे लुटा के सब कुछ.
सब खो दिया अब बचा नही कुछ.
यहाँ कदम कदम पर उन्नति की बात होती है.
नेता अभिनेता बन कर अपनी रोटियाँ सेक्ते हैं.
और लोग आँसुओं से दिए जला कर जीते हैं.
नीति तो बनी पर उसपे राजनीति क्यूँ हुई.
ऐसी इस्थति पैदा ही क्यूँ हुई???

वो कहते हैं ग़रीबी हटाएँगे.
खुशहाली और मुस्कुराहट लाएँगे.
जो रोशनी मे जीते हैं उन्हे अंधेरा कैसे समझ आएगा?
रोटी ना मिलने का दर्द कैसे पता चल पाएगा?
जिन पर बीती है उनसे पूछो भूख क्या होती है.
बिना सब्ज़ी के पानी से रोटी कैसे खाते हैं?
हद तो तब होती है जब पानी भी ना मिले.
भूख मिटाने को…
आँसू के साथ ही रोटी खा लेते हैं.
आज़ाद तो हो गये पर आज़ादी मिली कहाँ?
भूख से मरते हुए अब भी हैं लोग यहाँ.
हर गली, नुक्कड़ चौराहों पर नज़र डालो.
कुछ वक़्त निकाल कर ज़रा इन्हे भी संभलो.
देख रहा हूँ मैं ये नज़ारा कई वर्षों से.
हर रोज़ लोग मरते हैं भूख से.
इतने वादे इतने कदम कहाँ रह जाते हैं.
समझ नहीं आता ये भूख से लोग मरते ही जाते हैं.
इन्हें कपड़े नहीं हैं तन ढकने को.
ठंड से तिठुरते…
ढक लेते है पेट अपने पाँव से.
नीति बनाने वालो कहाँ है वो नीति?
सच तो ये है…
यहाँ नीति मे राजनीति चलती है.
पिसते हैं बुज़ुर्ग और गारीद पर इनकी रोटियाँ सिकटी हैं.
दुख होता ये जान कर.
नीति तो बनी पर उसपे राजनीति क्यूँ हुई.
ऐसी इस्थति पैदा ही क्यूँ हुई???

– Ashish Kumar