मैं रोया तो नहीं …


मौसम के अलग अलग मिज़ाज़ मे.
ज़िंदगी के हर उतार चढ़ाव मे.
औरों के घाव को मरहम लगते हुए.
और खुद के घाव पे नमक छिड़कते हुए.
मैं रोया तो नहीं पर आँसू निकल पड़े.
दिल ऐसा टूटा की टुकड़े भी ना मिले.

राहों मे अंधेरों का सामना करते हुए.
औरों के दुखों को मिटाते हुए.
खुद को खेलने का प्रयोगशाला बनाते हुए.
सब धोखों को झेलते हुए.
मैं रोया तो नहीं पर आँसू निकल पड़े.
बनावटी इस दुनिया मे हम अकेले पर गये.

शोर के इस वातावरण मे.
ज़िंदगी ने ज़हर ऐसा उगला.
मौत भी मुँह मोर कर चली गयी.
पर उस वक़्त मैं ना पिघला.
आँखों की लालिमा करती है कुछ इशारे.
दफ़ना दो उन ख्वाबों को जो नहीं हैं हमारे.
आवाज़ों के बाज़ारों मे खामोशी पहचानता कोई नहीं.
जो होना था वो हो गया बस अब और नहीं.
रह गया उस मंज़र और इस मंज़र मैं, अकेला.
चलो बनता हू इक दुनिया जो होगा रंगीला.
पर उस वक़्त…
मैं रोया तो नहीं पर आँसू निकल पड़े.
हम दिल पर पत्थर रख , किसी और दिशा चल दिए.

Ashish Kumar

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