ज़िन्दगी का खेल ।


ज़िन्दगी की रीत है ये पुरानी । 
खेल खेलती है ये बरी सयानी । 
कभी मिलाती है तो कभी छुपाती है । 
हर बार ये क्यूँ इतना सताती है । 
                       नया चेहरा नए लोग मिलते हैं । 
                     कारवां पीछे रह जाते हैं । 
                       मिल के बिछरने का नियम किसने है बनाया । 
                     अगर बिछरना ही था तो उसने हमें क्यों मिलाया । 
              
खोने का खौफ ही सताता है । 
फिर भी किसी को कोई क्यूँ चाहता है । 
जुदा होने का तकलीफ बहुत होता है । 
साथ छूटने का ग़म बड़ा रुलाता है । 
                          ये ज़िन्दगी का चक्र है । 
                          ये तो चलता रहेगा । 
                        अच्छा हो या बुरा । 
                         सत्य तो स्वीकारना पड़ेगा । 
ज़िन्दगी के हर मोड़ पर है एक कहानी । 
खेल खेलती है ये बड़ी सयानी । 
मौसम की  तरह ये है रंग बदलती । 
येही ज़िन्दगी है जो हर वक्त करवट है बदलती । 
                         life
  आशीष कुमार 
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