यहाँ सब कुछ बिकता है ।


यहाँ सब कुछ बिकता है । 
तन , मन , ईमान और धरम । 
आता नहीं है दूसरों पे रहम । 

     यहाँ सब कुछ बिकता है । 
     अपनापन , अकेलापन , मानवता और इंसानियत । 
     बची है तो सिर्फ हैवानियत । 

यहाँ सब कुछ बिकता है । 
दिल, दिलवाले, प्यार और मोहब्बत । 
रह गयी है सिर्फ दिखावट । 

      यहाँ सब कुछ बिकता है । 
      हंसी , ख़ुशी , दुःख और दर्द । 
      नहीं है कोई किसी का हमदर्द । 
    
चारों तरफ है झूठ और शोर का बोलबाला । 
जिसमे  दब के रह जाती है सच्चाई की पाठशाला । 

मिलता नहीं है किसी इन्सान में राम और कृष्ण । 
पर …
दिखाई देता है हर इन्सान में रावण और कंस । 
    यहाँ सब कुछ बिकता है । 
     रोटी , कपड़ा , मकान और इन्सान । 
     दफ़न कर दिया गया है ईमान । 
क्यूँ बन गयी ये दुनिया एक ऐसा बाज़ार ?
जहाँ सब कुछ होता है तार – तार । 
है कौन ज़िम्मेदार ?
मानव या मानवता ???
    – आशीष कुमार    

 

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