दास्तान |


कभी हम साथ चले थे । 
एक अनजानी राह पर । 
जिस पर कोई राहगीर न था । 
ख़ामोशी की परछाई में । 
आवाज़ पहचानने वाला कोई न था । 
ऐसे भी ” कभी हम साथ चले थे । “
          राह में सिर्फ़ अनजाने चेहरे थे । 
          होंठों पर बनावटी मुस्कुराहट लिए हुए । 
          हर तरफ़ सिर्फ धुँध फैला हुआ ।
          जैसे लाशों पर कफ़न ओढ़े हुए । 
वो पल बीत तो गया आखिरकार । 
पर समझ न आया तुम्हारा वो सरोकार । 
काफ़ी मशक्कत से समझाया था दिल को । 
बरी मुश्किल से रोका था आँसुओं को । 
जो रुह में कभी जली थी एक चिंगारी । 
वो तो बुझ गयी और टूट गयी फूलों की क्यारी । 
रातों के अंधियारे में और दिन के उजाले में मेरी हालत है कुछ इस कदर :
     ” नींद तो आती है पर नींद होती नहीं । 
        सुबह तो होती है पर सुबह आती नहीं । “
     – आशीष कुमार