दास्तान |


कभी हम साथ चले थे । 
एक अनजानी राह पर । 
जिस पर कोई राहगीर न था । 
ख़ामोशी की परछाई में । 
आवाज़ पहचानने वाला कोई न था । 
ऐसे भी ” कभी हम साथ चले थे । “
          राह में सिर्फ़ अनजाने चेहरे थे । 
          होंठों पर बनावटी मुस्कुराहट लिए हुए । 
          हर तरफ़ सिर्फ धुँध फैला हुआ ।
          जैसे लाशों पर कफ़न ओढ़े हुए । 
वो पल बीत तो गया आखिरकार । 
पर समझ न आया तुम्हारा वो सरोकार । 
काफ़ी मशक्कत से समझाया था दिल को । 
बरी मुश्किल से रोका था आँसुओं को । 
जो रुह में कभी जली थी एक चिंगारी । 
वो तो बुझ गयी और टूट गयी फूलों की क्यारी । 
रातों के अंधियारे में और दिन के उजाले में मेरी हालत है कुछ इस कदर :
     ” नींद तो आती है पर नींद होती नहीं । 
        सुबह तो होती है पर सुबह आती नहीं । “
     – आशीष कुमार  
 
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…SORROW AND HOPE…


A dew of dust coming from everywhere.

Want to destroy them forever.

An unexpected tie-up between desert and rain.

That left me to walk in vain.   

empty

 

Noting the sensation of the wind.

For a moment, made me to stand still.

Things might happen which are obscene.

Now its time to clear all those “scene”.

 

Fighting spirit is needed sometime.

That will carry you ahead of time.

Tolerating the taunting situation in light and dark.

Made me to think “how people can bark?”

 

Its time to wait…

Because,

the wind will change its direction.

As

every action has an equal and opposite reaction.”

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– by Ashish kumar