ऐसा क्यूँ हुआ |


काफी मशक्कत से  मैंने इक घर बनाया था आलिशान |
पर वो भी टूट गया क्यूंकि अचानक से आया तूफ़ान |
बरसों से हार रोज़ देखता था मैं इक ख्वाब |
पूरा होते हुए भी न पूरा हो पाया मेरा वो ख्वाब |
माना की मुझे इक बहुत बरी सजा मिली |
पर मैंने ऐसी भी क्या गलती कर दी |
मेरी आंसुओं की कीमत कोई न समझ पाया |
इक चिराग जला था पर किस्मत ने उसे भी बुझा डाला |
मुझे नहीं मालूम  ऐसा क्यूँ हुआ “…
 
थक चूका हूँ मैं अब और नहीं होता |
किसी का सहारा होता तो मैं जी भर कर रोता |
अँधेरे में रौशनी अब मैं कभी नहीं तलाशूंगा |
भूल कर भी किसी की मदद करने मैं नहीं जाऊंगा |
पर मुझे नहीं मालूम ” ऐसा क्यूँ हुआ ” ???
          – आशीष कुमार