ऐसा क्यूँ हुआ |


काफी मशक्कत से  मैंने इक घर बनाया था आलिशान |
पर वो भी टूट गया क्यूंकि अचानक से आया तूफ़ान |
बरसों से हार रोज़ देखता था मैं इक ख्वाब |
पूरा होते हुए भी न पूरा हो पाया मेरा वो ख्वाब |
माना की मुझे इक बहुत बरी सजा मिली |
पर मैंने ऐसी भी क्या गलती कर दी |
मेरी आंसुओं की कीमत कोई न समझ पाया |
इक चिराग जला था पर किस्मत ने उसे भी बुझा डाला |
मुझे नहीं मालूम  ऐसा क्यूँ हुआ “…
 
थक चूका हूँ मैं अब और नहीं होता |
किसी का सहारा होता तो मैं जी भर कर रोता |
अँधेरे में रौशनी अब मैं कभी नहीं तलाशूंगा |
भूल कर भी किसी की मदद करने मैं नहीं जाऊंगा |
पर मुझे नहीं मालूम ” ऐसा क्यूँ हुआ ” ???
          – आशीष कुमार
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…DEDICATION…


A day will come.

When a light will burn in water.

Slowly and slowly burning all the obstacles.

Cutting the motion of all the dead hopes.

Preparing for a big journey by a new slope.

 

A ray of light coming from dark.

Making a new path instead of having so many people’s bark.

Sending the messages to the nerves.

So that not to become nervous.

 

Frustration, depression are out of service…

The only thing left is ” dedication”…

 

 

 

 

 

– by Ashish kumar