प्यार का दर्द |


करते थे जिसके लिए हम रूप श्रृंगार |
कर के चली गयी मेरे दिल पे वार |
उसकी याद में मैं तारे गिनता चला गया |
रो रो कर आंसूं पीते चला गया |
मैं अपने प्यार का इजहार कर न सका |
अपने दिल की बात जुबान पर ला न सका |
किस्मत को शायद यही  मंज़ूर था |
मुझे नहीं मालूम मेरा क्या कसूर था |
            – आशीष कुमार

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